Monday, June 28, 2010

सालों की बेड़ियों में जकड़ा
कद के हिसाब से बनती सत्ता की बेड़िया
एक, दो, तीन का पहाड़ा पढाती
गिंतियो में बधा ये सुख बहुत बड़ा
अपनी मात्रभूमि से भी काफी बड़ा
समझौता इस सुख की आत्मा है
तभी सभी सत्ताधारी समझौतावादी हो जाते है
कभी मुलायम तो कभी माया के जाल में जकड़े
उम्मीदों की नाव पर सवार,सत्ताधारी होने का ख्वाब
और जनता की आह के बीच
सत्ता का सुख आधा होता है

Monday, May 31, 2010

किसकी कितनी जगह है दिल में कौन यहाँ बेगाना है
बारह घंटे बने हकीकत बाकि सब तो फ़साना है
जोड़ तोड़ में बटी है दुनिया, बही पलटते दिन बीता
किसने पाया कौन है हारा, ये कौन बतलाता है
कंधे पर यू बांध पोटली चल दो राह पकड़ प्यारे
ये दुनिया बेगानी साथी अब किसे लौट कर आना है
दस्तूर भी है, सिद्धांत यही, जब समझो तब समझ खुले
बही पलटते बीता जीवन अब कैसा पछताना है
कलम बदल गयी लोगो के मिजाज़ की तरह, सियासत और सरकार की तरह,
समाज क्या बदला कलम भी बदल डाली, अब किसे याद है श्याही की होली
शब्दों को बदलने के लिए पड़ा लिखा होना जरूरी था, बड़ी माथापच्ची थी
पूरे समाज को इस काम के लिए साथ लेना जरूरी था, कौन पचड़े में पड़ता
हमने अपनी सारी खुन्नस कलम पर ही उतारी, कलम बदल डाली
जिस तरह हमने कलम बदली, खुद को भी बदला होता
स्वार्थ का फटा चोला उतार कर मानवता का दामन पकड़ा होता
बहुत पचड़े थे इस कम को अंजाम तक पहचाने में, खुद भी फसने का डर था
लोगो की सोच बदलने की छमता थी कहा किसी में, सोचा कलम बदल डालो
कलम बदल जाएगी तो शब्द भी बदल जाये शायद, शब्द बदले तो शयद बदल जायेगा समाज
लेकिन कुछ नहीं बदला, सिर्फ कलम बदली, उसने सही और गलत की सोच ही बदल डाली

Sunday, May 30, 2010

अम्मा जाओ, बड़े आये पाठ पड़ने
किताबी ज्ञान की चाट की दुकान सजाने
अवसरवाद के पानी में डुबो कर बनाये गाये गोलगप्पे
भ्रस्टाचार की सीक में पिरोये दोने में हमे नहीं खाने
तुम्हारी टिकिया पर भिनभिनाती लालच की मक्खिया
लोगो की भूख और लाचारी की दही में डूबे दहीबड़े
नैतिकता के कचालू में पड़े आलू सड़े गले
इन पकवानों के खरीदार और है
उनके पेट की आग और है
वो इन्हें पचा लेगे, लोगो का हक़ खाना उनकी आदत है
हमको अपनों का हक़ खाने की आदत नहीं
कोई और ग्राहक पटाओ, अम्मा जाओ
बड़े आये पाठ पड़ाने

Tuesday, May 25, 2010

चलो सपना देखा जाये, तारो को अंगूठी में पिरोना
आधे चाँद का झूला बना कर पेंग बढाना
आसमान पर पैदल चल कर बादलों से बूंद चुराना
ओस कि बूंद से ढकी घास पर गुलाटी खाना
समुद्र के भीतर मकान बनाना
बरफ से ढके पहाड़ पर धूप सेकना
आकाश में उड़ रही चिडियों को दाना चुगना
सपने है इसलिए इन्हें देखा जा सकता है
लेकिन अब तो सपना देखना भी नामुमकिन सा है
प्रदुषण ने तारो को ढक लिया है
चाँद पर चरखे पर सुँत काटती नानी मर चुकी है
ओस कि बूंदों पर चलना सच सपना ही है
समुद्र प्रदूषण का कोप झेल रहे है
बरफ पहाड़ो पर आब पड़ती ही नहीं
चिडया लुप्त हो रही है
इसलिये सपना देखो हकीकत नहीं देख पाओगे
साल पूरा होने कि वर्षगाठ, क्या मनानी चाहिये,
आदमी को एक हद तक रुलाना चाहिये
आख का पानी गर सूख गया हो तो कहो,
उनकी शुद्धि के लिये एक और भागीरथ चाहिये
झूठ का गुणगान जब तक सहें तब तक करो,
अधिक बोलने से बेहतर चुप ही रहना चाहिये
महगाई कि मार से अधजले पड़े है चूल्हे
इस बात पर हुक्मरानों को शर्म आनी चाहिये
सालगिरह कि सुबह हुवा एक और हादसा
दो दिनों के बाद ट्रेन का रुका रास्ता
नक्सलियो की गोलिया सुर्ख कर रही खाखी को
आखिर क्या हो गया इस देश कि थाती को
इस पर भी दो मिनट का मौन रखना चाहिये
सरकारों को शुद्ध करने के लिये भागीरथ चाहिये

Monday, May 24, 2010

भूखा बचपन आभावो से भरी जवानी
इंसानों कि भीड़ न दाना और न पानी
घिसी पिटी सी सोच दकियानूसी कहानी
आओ हम सब मिल कर गए हम है हिन्दुस्तानी
विकास देश का हो गयी बिसरी कहानी
बेरोजगारी में सूख रही देश की जवानी
घिसी पिटी सी सोच दकियानूसी कहानी
आओ हम सब मिल कर गाये हम है हिन्दुस्तानी
विकास कि राह सभी ने जेबे भरने कि ठानी
उन्हें क्या मतलब कहा गयी बिजली और पानी
घिसी पिटी सी सोच दकियानूसी कहानी
आओ हम सा मिल कर गाये हम है हिन्दुस्तानी
परायी भाषा हमने अपनाने कि ठानी
हिंदी के साथ हो रही आब भी बेमानी
घिसी पिटी सी सोच दकियानूसी कहानी
आओ हम सा मिल कर गाये हम है हिन्दुस्तानी