Saturday, October 9, 2010

ओस की बूंद पर चमकती कुनकुनी धूप,,
उमीद की घास को और हरा करती है,,
ओस के साथ पलते सपने भी कुनकुने ,,
उनकी नाजुक कलाईयों की तरह अनमने,,
कुछ पाने की अभिलाषा में तल्लीन,,
तन्हाई की आगोश में लिपटे, सिमटे,,
मंद मंद बहती ठंडी बयार, सिहराती,,
चुपचाप जवानी की तरफ बढ जाती,,
सुबह से शाम, शाम से रात, यही चक्र है,,
जीवन का. यही फलसफा भी, खुद का,,,

Wednesday, October 6, 2010

मुस्लमान मस्जिद से और हिन्दू मंदिर से, कब तक जाना जायेगा,,,,
क्या भारत में मौलाना और पंडित ही पहचाना जाएगा,,,,
मस्जिद और मंदिर में फसेगी कौम की प्रतिष्ठा,,,,
भूल गये देश के प्रति निष्ठा,,,,
मुस्लमान और हिदू को वोट बैंक न बनाओ,,,,
मंदिर मस्जिद के झगडे में इनको मत उलझाव,,,,
विकास का सपना इनको भी देखने दो,,,,
इंसान है ये इनको इंसान बने रहने दो,,,,

Tuesday, October 5, 2010

भूखो को रोटी मिलना एक सपना है
इनको पलने दो, जवानी तक
रोज़गार की बाते, शिक्षा की शिक्षा
सरकारी काम से ज्यादा भी कुछ है
हिंदुस्तान नारों को बनाने और भुलाने वाला
रोटी कपड़ा और मकान का ख्वाब दिखाने वाला
जय जवान जय किसान को क्यों भूल गया
सपने देखने में कोई मनाही नहीं
सरकार और सत्ता यहाँ सपना देखती है
इसी लिये सरे जहा से अच्छा हिंदुस्तान हमारा गाती है

Wednesday, September 29, 2010

मेरे सहर को महफूज़ रखना.मंदिर मस्जिद से इसे दूर रखना
यहाँ की फिजा का रंग बसंती है,यहाँ के दरवाज़े भी अकबरी है
वाजिद अली साह की वो इन्दर सभा
गंगा जमुनी तहजीब की वो सफा
नवाबियत के अफसाने और गीत
सहरे लखनऊ में मिलता है मोहब्बत का संगीत
महज़ कुछ लोगो का लखनऊ नहीं ये
हिन्दू मुसलमानों का सहर नहीं ये
ये जन्नत है इंसानों की, मोहब्बत की पैगामो की
ये लछमनपुरी है, ये है अपना लखनऊ

Tuesday, September 28, 2010

क्या होगा मंदिर, मस्जिद, मीनारों का
पत्थरो के भीतर कही भगवान बसते है
उन्हें देखो ऊपर की तरफ आख़े गड़ाए
खुदा की आस में आसमान तकते है
ये मंदिर वो मस्जिद, ये पीर वो फकीर
लालची नजरो से इन्सान तकते है
गर मंदिर बना तो क्या हासिल होगा
गर मस्जिद बनी तो क्या खो दोगे
वक्त बहुत है लौट चलो घरो की तरफ
आख उठा कर देखो अपनों की तरफ
इंसान बनना बहुत आसन है, बनो
न हिन्दू बनो न मुस्लमान बनो

Tuesday, July 20, 2010

पलकों में काटी है कई रात, ख्वाबो में देखा है तुम्हे बहुत जतन के बाद
स्वागत है ओ बारिश की बूंदों, आओ मेरी प्यारी बरसात
ये सड़को का भरना के अखबारों का विलाप
हमेशा होता है तुम्हारे आने पर, इनकी बेरुखी से रूठ न जाना
पड़े लिखो को गाव की सुध कहा. ठण्डे कमरों का उन्हें ख्याल है
हड्डी की ढाचे में तब्दील हो चुका किसान उन्हें नहीं दीखता
उन्हें तो अपनी सड़क और घर के सामने की गली याद है
बहुत हुवा तो सहर में रहने वाले उन जैसे उनको दीखते है
पन्नियो के ढकी नाली और डूबी मोटरों का खौफ
इससे ज्यादा नहीं बढ पाए ये, दिल्ली को देश मान लिया इन्होने
खूब बरसो, झमाझम बरसो ऐ बरखा रानी
किसान और खेत दोनों मांग रहे है पानी

Monday, June 28, 2010

सालों की बेड़ियों में जकड़ा
कद के हिसाब से बनती सत्ता की बेड़िया
एक, दो, तीन का पहाड़ा पढाती
गिंतियो में बधा ये सुख बहुत बड़ा
अपनी मात्रभूमि से भी काफी बड़ा
समझौता इस सुख की आत्मा है
तभी सभी सत्ताधारी समझौतावादी हो जाते है
कभी मुलायम तो कभी माया के जाल में जकड़े
उम्मीदों की नाव पर सवार,सत्ताधारी होने का ख्वाब
और जनता की आह के बीच
सत्ता का सुख आधा होता है