Thursday, April 14, 2011

रिश्तों की गर्मी का सबब काश पुराना होता
इस बार पडोसी का वादा न फ़साना होता
तमाम बार वही बात वही फलसफे
कभी पुरानी टीस कभी रतजगे
कही तो यादो का कारवा सुस्तायेगा
कही वो अपनी आदत से बाज़ आएगा
एक बार वो गैरत भी जाग जायेगी
यक़ीनन सुबह का भूला शाम को लौट आएगा